सारांश- किसी भी समाज के विकास में पुस्तकों की बहुत अहम भूमिका होती है। पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। पुस्तकें पढ़ने की आदत के विकास के साथ-साथ व्यक्तित्व के विकास में भी बहुत मदद करती हैं। पढ़ने की आदत का विकास अगर बचपन से किया जाए तो इसका बच्चों के जीवन में बहुत प्रभाव रहता है। पढ़ने के कई उद्देश्य होते हैं, जैसे कि कोई जानकारी लेना, उसे समझना व उसका विश्लेषण करना, अन्वेषण करना, सोच-विचार करना, उसका विस्तार करना, सृजनात्मकता व ज्ञान अर्जन करना। प्राथमिक स्तर पर बच्चों की पढ़ने की आदतों का विकास हो, इसकी ज़िम्मेदारी पूर्ण रूप से शिक्षक तथा अभिभावकों पर रहती है। पुस्तकालय, ज्ञान और भाषा के बीच सेतु का काम करता है। राष्ट्रीय बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान मिशन (यानी निपुण भारत मिशन) की शुरुआत भारत सरकार द्वारा की गई है। इस मिशन का उद्देश्य 2026–2027 तक कक्षा तीन तक के बच्चों को समझ के साथ पढ़ना, लिखना और बुनियादी संख्या ज्ञान कराना है। इसके लिए मिशन का एक और महत्वपूर्ण उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों के लिए एक ऐसे भाषा समृद्ध परिवेश का निर्माण करना है जिसमें वे सहज रूप से विभिन्न प्रकार के बाल साहित्य द्वारा अपने पठन कौशल, भाषा साक्षरता और पढ़ने की आदत विकसित कर सकें। इस दिशा में बाल उपयोगी पुस्तकालय या कक्षा में पठन कोना एक मुख्य भूमिका निभाता है। प्रस्तुत लेख में बच्चों की पढ़ने की आदत का किस प्रकार से प्राथमिक शालाओं में विकास किया जाए तथा कैसे अभिभावकों को भी सम्मिलित किया जाए, उस पर प्रकाश डाला गया है।
बीज शब्द- प्राथमिक, शालाओं, रीडिंग कॉर्नर, पठन ।
पुस्तकालयों की प्रासंगिकता की बात की जाए तो गिजूभाई बधेका के यह शब्द इस के महत्व से हमें परिचित कराते हैं कि एक अच्छा पुस्तकालय कई शिक्षकों की आवश्यकता को पूरी करता है। पुस्तकालय विद्यार्थियों को न तो धमकाता है, न उनसे अनुशासन की अपेक्षा करता है, न कक्षा में प्रबंधन पर ज़ोर देता है, न मिथ्या स्पर्धा में प्रवेश कराता है और न परीक्षा का भय बनाता है। वह तो अपने पास आने वालों को प्रेमपूर्वक, विनयपूर्वक और रुचिपूर्वक पढ़ाता रहता है। पुस्तकालय के सार्थक इस्तेमाल से बच्चे यह अनुभव कर सकते हैं कि पढ़ना एक मज़ेदार काम है। एक बार जब बच्चे यह सीख जाते हैं तो उसके बाद स्वयं ही पढ़ने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 व निपुण भारत मिशन के लक्ष्य भी इसी ओर मुखरित हैं।
पुस्तकें बच्चों में रचनात्मकता, तर्क शक्ति, चिंतन, सकारात्मक सोच, लेखन कला, शब्द भंडार में वृद्धि के साथ-साथ मौखिक एवं लिखित भाषा कौशल की क्षमता का विकास करने में सहायक होती हैं। पढ़ने की प्रक्रिया को सहज बनाने के लिए पुस्तकालय के साथ-साथ अभिभावकों व समाज की भागीदारी भी यदि सुनिश्चित हो तो निश्चय ही सक्रिय पुस्तकालय एक सशक्त माध्यम के रूप में विकसित हो सकते हैं। बच्चों में पढ़ने की आदत का विकास करने के लिए कक्षा-कक्ष में एक पठन कोने की विशेष भूमिका है। कक्षा में अनुकूल व आनंदमय वातावरण तैयार करना बहुत ही आवश्यक है, जहाँ बच्चे पढ़ने के लिए प्रेरित हों। पुस्तकों को व्यवस्थित रूप से कक्षा-कक्ष में प्रदर्शित किया जाए जिससे बच्चे पुस्तकों की ओर आकर्षित होकर पठन की ओर अग्रसर हों।
बाल-केंद्रित शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पठन कोने को बच्चों की रुचि, योग्यता, आयु व पठन स्तर के अनुरूप तैयार किया जाता है। हर बच्चे की पठन में रुचि, क्षमता, योग्यता व गति एक-दूसरे से अलग होती है। पठन कोना सभी बच्चों को समान अवसर व सामग्री प्रदान कर उनकी पढ़ने की क्षमताओं का विकास करने में सहायता करता है। स्वतंत्र रूप से बच्चों को यह अवसर देना कि वह कौन-सी किताब पढ़ना चाहते हैं, वे अपनी रुचि अनुसार अपनी पुस्तकों का चयन करते हैं जिससे यह भी पता लगता है कि बच्चे की किस विषय में रुचि है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव की अपेक्षा की गई है। शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले शोध व अध्ययन बताते हैं कि समझ के साथ पढ़ना व किताबों में रुचि का विकास बच्चों के लिए पढ़ने को एक आनंददायी प्रक्रिया बना देता है। इस नीति के अनुसार ‘बुनियादी साक्षरता’ को सीखने के लिए पठन एक तात्कालिक आवश्यकता और पूर्व शर्त है। इस दिशा में बाल उपयोगी पुस्तकालय या कक्षा में पठन कोना एक मुख्य भूमिका निभाता है। बच्चों के लिए बाल उपयोगी पुस्तकालय का आशय पुस्तकों का ऐसा संग्रह है जो बच्चों के पठन स्तर व रुचियों के अनुसार हो, जिसमें बच्चों को विभिन्न पठन गतिविधियों के दौरान भागीदार बनने का अवसर मिल सकें तथा बच्चों में किताबों से भावात्मक जुड़ाव बन सके। इसके साथ ही बच्चे निर्धारित पुस्तकालय कालांश या खाली समय में किताबों को पढ़ सकें और किताबों को पढ़ने के लिए घर भी ले जा सकें।
निपुण भारत मिशन 2022 के अंतर्गत भी ऐसे पुस्तकालय की बात की गई है।
• जो बच्चों के पठन स्तर, रुचि एवं आयु के अनुसार पुस्तकें उपलब्ध कराता हो तथा उनमें तार्किक चिंतन, कल्पनाशीलता एवं विश्लेषण क्षमता का विकास करता हो। बच्चे स्वतंत्र पठन, मुखर वाचन व सह-पठन कर सकें। बच्चे विभिन्न प्रकार के बाल साहित्य से परिचित हो सकें जो कि उनकी रचनात्मकता, कल्पना शक्ति व बौद्धिक विकास हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है।
• पुस्तकों का चयन सटीकता से किया जाए, जिसमें बच्चों की आयु, पठन क्षमता व उनकी विविध रुचियों का ध्यान रखा जाए। हर कक्षा में एक सक्रिय व बाल उपयोगी पुस्तकालय की स्थापना हो जहाँ बच्चे सक्रिय रूप से पुस्तकें साझा कर सकें और ये पुस्तकें सभी विद्यार्थियों की पहुँच में हों।
• प्रिंट समृद्ध वातावरण हो जो बच्चों को विविध रूप के प्रिंट से संवाद करने का अवसर प्रदान कराता है। एक कक्षा-कक्ष में स्थान व वस्तुओं को चिह्नित करके उनके नाम लिखे जा सकते हैं। बच्चों की लेखन की प्रतियाँ लगाकर शब्द दीवार बनाएँ। कुछ विषय संबंधी चित्र, चार्ट व पोस्टर लगाकर कक्षा-कक्ष को प्रिंट समृद्ध बनाया जा सकता है। जिससे पुस्तकों के प्रति लगाव उत्पन्न हो और बच्चों में पढ़ने की समझ बनें। बच्चे विभिन्न प्रकार की भाषाओं की पुस्तकों से परिचित हो सकें, बच्चों में साहित्य बोध हो और उन्हें अच्छे साहित्य से परिचित कराया जा सके। पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए परिवार, विद्यालय व समुदाय की सहभागिता हो। प्राथमिक विद्यालयों में पुस्तकालय के दो प्रकार हो सकते हैं— पहला, कक्षा-कक्ष के भीतर ही किसी कोने में पठन कोना जिससे कक्षा में पुस्तकालय की स्थापना की जाए। दूसरा, किसी अतिरिक्त कक्ष की उपलब्धता होने पर उसे बाल पुस्तकालय का स्वरूप दिया जाए।
पठन कोना या कक्षा-कक्ष पुस्तकालय
कक्षा में पुस्तकालय हेतु कोना या कक्षा-कक्ष पुस्तकालय की स्थापना कर सकते हैं। इसकी स्थापना कक्षा-कक्ष के भीतर होगी। कक्षा-कक्ष पुस्तकालय या पठन कोना बनाते समय ध्यान रखने योग्य बिंदु—
• प्रत्येक कक्षा में बच्चों की रुचि, आयु व पठन स्तर के अनुरूप किताबों का चयन और उसका बेहतर ढंग से प्रदर्शन किया जा सके, ताकि बच्चे स्वतंत्र रूप से किताबों को पढ़ सकें।
• कक्षा-कक्ष पुस्तकालय में किताबों को नियमित अंतराल पर बदलते रहना ज़रूरी है, ताकि बच्चों की किताबों में रुचि बनी रहे।
• कक्षा में उपयुक्त प्रकाश व्यवस्था के साथ पढ़ने के लिए अनुकूल स्थान का चयन करना चाहिए।
• बच्चों के साथ किताबों के लेन-देन के लिए रजिस्टर का इस्तेमाल करें और बच्चों को किताब पढ़ने के लिए घर ले जाने हेतु प्रोत्साहित करें।
• एक अवधि के पश्चात बच्चों को पठन कोने में रखी किताबों के लेन-देन के कार्य से भी जोड़ा जा सकता है।
• बच्चों के साथ नियमित रूप से विभिन्न पठन गतिविधियों का आयोजन करें और स्वतंत्र रूप से पढ़ने का अवसर भी दें।
• पठन के साथ-साथ इस बात की भी सुविधा हो कि बच्चे एक-दूसरे के साथ अंतर्क्रिया व वार्तालाप कर विभिन्न विषयों पर चर्चा भी कर सकें।
• इन सभी बातों के अतिरिक्त पठन कोना बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि यह अधिगम केंद्र के रूप में विकसित हो जहाँ बच्चे अपनी रुचि के अनुसार पठन प्रक्रिया का आनंद ले सकें।
पठन कोने की स्थापना— किताबों का चयन
एक सक्रिय बाल पुस्तकालय या पठन कोने में किताबों का चयन बच्चों की आयु, रुचि एवं सांस्कृतिक विविधता के अनुरूप होना चाहिए। पुस्तकों के चयन में विभिन्न आयामों, जैसे— विधाओं, शैलियों, प्रारूपों और विषयों का ध्यान रखा जाए, जिससे बच्चों को कहानी के साथ-साथ कविताएँ, लोक कथाओं व नाटक जैसी अन्य विधाओं से भी परिचित होने का अवसर मिल सके। किताबों का चयन करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे कि-
• बच्चों की आयु, रुचि एवं पठन का ध्यान रखते हुए पर्याप्त संख्या में पुस्तकों का चुनाव करना चाहिए, ताकि बच्चे तरह-तरह की पुस्तकों से परिचित हो सकें।
• पुस्तकों का आकार-प्रकार इस तरह का हो कि बच्चे सरलतापूर्वक उलट-पलट कर सकें।
• बच्चों में भाषा की क्षमताओं और परिवेश का ध्यान रखते हुए किताबों का चयन करना चाहिए।
• पुस्तक संकलन में विधाओं का समावेश विस्तृत होना चाहिए, जैसे— लोक कथाएँ, गीत, खेल-गीत, कॉमिक्स, सरल भाषा में महान व्यक्तियों की जीवनी, परिवेश से जुड़े विषय, पिक्चर बुक आदि।
• किताबों की विषय वस्तु सरल होनी चाहिए। छोटे किंतु सार्थक व सरल संरचना वाले वाक्य होने चाहिए।
• भाषा और चित्रों का भी ध्यान रखना चाहिए। सभी चित्र विषय से संबंधित होने चाहिए।
• अगर विद्यालय में कुछ विशेष आवश्यकता वाले बच्चे हैं तो उनके लिए ब्रेल लिपि में भी साहित्य उपलब्ध होना चाहिए।
पठन की ओर बढ़ते कदम
पठन कोने में किताबों का प्रदर्शन
पठन कोने या कक्षा-कक्ष पुस्तकालय में किताबों को प्रदर्शित करना भी अपने आप में ही एक कला है। बच्चों को पुस्तकों की ओर आकर्षित करने में यह कला विशेष महत्व रखती है। शुरुआत में बच्चे पुस्तकों को छूकर, पलट कर और महसूस करके किताबों के साथ संवाद स्थापित करते हैं, लेकिन इस संवाद की शुरुआत प्रभावी रूप से तभी संभव है जब पुस्तकों का प्रदर्शन प्रभावी ढंग से हो जिसके लिए हमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए
किताबों के प्रदर्शन हेतु किसी खुली अलमारी, जूट या कपड़ों के बैग का इस्तेमाल करें। अगर यह भी उपलब्ध न हो तो डोरी के माध्यम से भी किताबों को प्रदर्शित किया जा सकता है। कक्षा में एक उचित जगह और उचित ऊँचाई पर रस्सी या डोरी टाँगकर पुस्तकें उपलब्ध एवं प्रदर्शित की जा सकती हैं।
• किताबों को ऐसी जगह प्रदर्शित करें जिससे वे बारिश व धूप से सुरक्षित रहें और बच्चों की पहुँच में हों।
• इस बात का ध्यान रखें कि कविताएँ, कहानी, पोस्टर व अन्य प्रदर्शन सामग्री बच्चों की पहुँच में हो। उनकी ऊँचाई इतनी ज्यादा न हो कि बच्चों को देखने, छूने, पढ़ने में परेशानी हो या दिखाई न दें।
• यदि कक्षा में चुनौतीपूर्ण बच्चे, जैसे— दृष्टि बाधित, श्रवण बाधित, अस्थि विकार, दिव्यांगता हो तो उन बच्चों को पुस्तकों से कैसे सुलभता हो। वे किस प्रकार स्वतंत्र रूप से पुस्तकें ले पाएँगे, उनका आनंद उठाएँगे, इसका भी स्थान विशेष आवश्यकतानुसार ध्यान रखा जाए।.
पठन कोने का संचालन
पठन कोने में व्यवस्थित ढंग से प्रदर्शित पुस्तकें बच्चों को स्वतंत्र रूप से पढ़ने के साथ-साथ समूह में पढ़ने की गतिविधियों में संलग्न होने के अवसर प्रदान करती हैं। आकर्षक ढंग से प्रदर्शित पुस्तकों की श्रृंखला कक्षा में बच्चों को गतिशीलता की स्वतंत्रता भी प्रदान करती है। पठन कोने की स्थापना होने के बाद तथा समय सारणी में कालांश सुनिश्चित होने के बाद प्रत्येक शिक्षक अपनी कक्षा के सभी बच्चों को आपसी सहमति से किताबों की देख-रेख, रख-रखाव तथा पठन कोने की साफ़-सफ़ाई संबंधित नियमों को बनाने के लिए कहें। उनके द्वारा आपसी सहमति से बनाए गए नियमों को किसी चार्ट पर लिखकर दीवार पर लगा दें। फिर कक्षा में रीडिंग मॉनिटर का भी चयन करें। पठन कोने में व्यवस्थित ढंग से प्रदर्शित पुस्तकें बच्चों को स्वतंत्र रूप से पढ़ने के साथ-साथ समूह में पढ़ने की गतिविधियों में संलग्न होने के अवसर प्रदान करती हैं। आकर्षक ढंग से प्रदर्शित पुस्तको की श्रृंखला कक्षा में बच्चों को गतिशीलता की स्वतंत्रता भी प्रदान करती है।
रीडिंग मॉनिटर एक साझा ज़िम्मेदारी
• रीडिंग मॉनिटर पठन कोने के संचालन के लिए ज़िम्मेदार होंगे और पुस्तकों के रख-रखाव की ज़िम्मेदारी भी इन्हीं की होगी।
• पठन कोने में से जो बच्चे एक सप्ताह में सबसे ज्यादा पुस्तकें पढ़ेंगे वे अगले सप्ताह के लिए रीडिंग मॉनिटर नियुक्त किए जा सकते हैं।
• पठन कोने के बेहतर संचालन के लिए किसी रजिस्टर में पुस्तकों के लेन-देन की व्यवस्था के बारे में रीडिंग मॉनिटर को बताया जा सकता है।
पढ़ने के लिए निर्धारित समय
• पठन कोने को सक्रिय करने के लिए यह आवश्यक है कि हर विद्यालय में अपने स्तर पर कक्षा अनुसार समय सारणी बनाई जाए जिसमें साप्ताहिक रूप से प्रत्येक कक्षा के लिए कम से कम दो कालांश पठन कोने के लिए निर्धारित हों, ताकि इस कालांश में बच्चे पठन कोने में से अपनी मनपसंद किताबें पढ़ पाएँ एवं शिक्षक बच्चों के लिए विभिन्न पठन गतिविधियों का आयोजन कर सकें।
• पढ़ने की संस्कृति विकसित करने के लिए प्रतिदिन 20 मिनट का निर्धारित पठन समय ज़रूर दें। ये समय या तो भाषा के कालांश के साथ निर्धारित करें या फिर विद्यालय में छुट्टी होने से पहले जो आखिरी कालांश हो उसमें निर्धारित करें।
बच्चे कहानी का आनंद उठाते हुए
किताबों का स्तरीकरण
• किताबों का स्तरीकरण बच्चों के पठन स्तर के अनुसार किया जाता है। इसके लिए शिक्षक रा.शै.अ.प्र.प. के चार रंगों वाली बरखा श्रृंखला के अनुसार किताबों को वर्गीकृत कर उन पर रंगों का स्टीकर लगा सकते हैं।
• किस स्तर की किताब बच्चों के लिए उपयुक्त होगी इसका पता लगाने और बच्चों को समझाने के लिए पाँच-पाँच अँगुलियों के नियम का इस्तेमाल किया जा सकता है।
पाँच अँगुलियों का नियम क्या है?
बच्चों द्वारा किताब पढ़कर सुनाते समय पढ़ने में होने वाली गलतियों को गिनते हुए बच्चों के पठन स्तर का पता लगाने का तरीका ही पाँच अँगुली वाला नियम कहलाता है। यह नियम पठन एवं लेखन कौशल से वंचित रह गए विद्यार्थियों को पठन-लेखन सीखने के लिए ‘मिशन बुनियाद’ कार्यक्रम द्वारा बनाया गया है और यह पूरी तरह से वैज्ञानिक है। इसका क्षेत्र परीक्षण भी किया गया था।
• इसका मतलब यह है कि अगर बच्चे पाँच वाक्यों को पढ़ते समय पाँच से ज़्यादा गलतियाँ करते हैं तो वह किताब उनके लिए बहुत मुश्किल है और यदि पाँच वाक्यों में एक गलती या कोई भी गलती नहीं करते हैं तो वह किताब उनके लिए बहुत आसान होगी जिससे उन्हें पढ़ने में आनंद नहीं आएगा।
• ध्यान रखें कि बच्चों को उनकी गलतियाँ न बताएँ और न ही ज़ोर-ज़ोर से गलतियों को गिनें या किसी प्रकार का गिनने का संकेत दिखाएँ। आप अपने मन में गलतियों को गिन सकते हैं।
1. किसे गलती मानें
• किसी शब्द को न पढ़ पाना या शिक्षक द्वारा शब्द पढ़े जाने का इंतजार करना किसी शब्द को सही तरीके से न बोल पाना या कोई दूसरा शब्द बोल देना कोई नया शब्द जोड़ देना या कोई शब्द छोड़ देना।
• यदि बच्चे वाक्य के प्रत्येक शब्द को अटक-अटक कर पढ़ते हैं तो उसे भी हम उस स्तर में नहीं मानेंगे, क्योंकि ऐसा करने पर वह धाराप्रवाह के साथ नहीं पढ़ पाएँगे और पढ़े गए का अर्थ समझना मुश्किल होगा।
2. किसे गलती न मानें
यदि बच्चे किसी शब्द को पहले गलत पढ़ते हैं और बाद में सही पढ़ते हैं, यदि गलत पढ़ा गया शब्द आगे के वाक्यों में बार-बार आ रहा है तो उसे एक ही गलती मानें। भाषा में क्षेत्रीयता के प्रभाव के कारण किसी शब्द के वर्ण का उच्चारण, जैसे ‘कोशिश’ को ‘कोसिस’ पढ़ना, बच्चों की उच्चारण संबंधी समस्याओं, जैसे तुतलाने व हकलाने के कारण सही उच्चारण न कर पाना आदि गलती न मानी जाए।
2. अभिभावकों एवं समुदाय की भागीदारी
• इसके लिए हमें यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि बच्चों को अभिभावकों द्वारा घर पर भी पठन अभ्यास कराने के लिए प्रेरित किया जाए।
• पठन कोना हर कक्षा में बनाने का उद्देश्य यही है कि हम कक्षा में पढ़ने वाले हर बच्चे के साथ-साथ उसके घर के सभी सदस्य व समुदाय तक अपनी पहुँच बनाएँ तथा उनको भी पठन कौशल सीखने, ज्ञान अर्जन करने और उनके व्यक्तिगत विकास में हम उनकी मदद कर सकें।
• एक बेहतर पठन कोने का निर्माण करने में परिवार के सदस्य भी अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं। उनके द्वारा अच्छी पुस्तकें दान में दी जा सकती है जिसे हम अपने पठन कोने का हिस्सा बना सकते हैं।
• समुदाय में परिवार के सदस्यों को विशेष दिनों में प्रार्थना सभा में आमंत्रित कर उनके द्वारा हम लोक कथाएँ, उनके क्षेत्र की प्रचलित कहानी आदि भी सुन सकते हैं जिससे बच्चों में अपनी संस्कृति के प्रति जागरूकता पैदा की जा सकती है, इससे बच्चों का शब्द भंडार भी बढ़ता है। लोक कथाओं के प्रस्तुतीकरण से पहले शिक्षकों को उन्हें पढ़ ज़रूर लेना चहिए, क्योंकि कुछ लोक कथाएँ जेंडर के प्रति संवेदनशील नहीं होती हैं।
एक समृद्ध पठन कोना बनाने का उद्देश्य यह भी होता है कि जब बच्चे इन पुस्तकों को लेकर अपने घर जाएँ तो उन्हें उन पुस्तकों को पढ़ने का समय मिले साथ ही रुचिकर पुस्तकों को उनके परिवार के अन्य सदस्य भी पढ़ें जिससे उनका साक्षरता का स्तर भी बढ़ता है तथा उनमें भी पढ़ने के प्रति रुचि विकसित होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कहा गया है कि सभी भारतीय और स्थानीय भाषाओं में दिलचस्प और प्रेरणादायक बाल साहित्य और सभी स्तर के विद्यार्थियों के लिए विद्यालय और स्थानीय पुस्तकालय में पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएँ। देश भर में पढ़ने की संस्कृति के निर्माण के लिए विद्यालय पुस्तकालय का विकास किया जाए। पठन कोना इस नीति को साकार करने की ओर एक सार्थक कदम है।
निष्कर्ष- प्राथमिक स्तर के बच्चों के सर्वांगीण विकास में अभिभावकों और शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बच्चों की भाषा का विकास तभी होगा, जब बच्चों को भाषा से समृद्ध वातावरण मिले जिसमें उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा मौके दिए जाएँ, जहाँ वे पढ़ने की ओर अग्रसर हों। बच्चों में पढ़ने की आदत पर विशेष ध्यान केंद्रित करने के लिए रुचिकर व सुलभ पठन सामग्री की उपलब्धता हो। देश में शिक्षा की नींव और बुनियादी शिक्षा को मज़बूत करने के लिए हर एक कक्षा-कक्ष में पठन कोने का निर्माण बहुत ही आवश्यक है।
संदर्भ सूची-
• कुंभार, रश्मि. 2009. भारतीय स्कूल पुस्तकालयों में पढ़ने को एक गुण के रूप में विकसित करना. https://www.researchgate.net/publication/291815215_Developing_Reading_as_a_Virtue_in_Indian_SchoolLibraries
• पठन की ओर बढ़ते कदम. 2023. राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली.
• राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020. https://www.education.gov.in/en/national-education-policy-2020
• राष्ट्रीय बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान मिशन. 2021. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली.
डॉ0 दिनेश कुमार गुप्ता
सहायक आचार्य,
अग्रवाल महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, गंगापुर सिटी (राज.)
दूरभाष: 9462607259
Mail: dineshg.gupta397@gmail.com

