आओ बातें करें

अरुणिता
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नववर्ष की प्रथम बेला और जनवरी की यह शीतल बयार हमें आत्म-चिंतन का अवसर देती है। जहाँ एक ओर हम तकनीकी प्रगति के सोपान चढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हम अपनी उस जड़ को विस्मृत कर रहे हैं जिसने सदियों से इस भू-भाग का पोषण किया है। वह जड़ है- अरावली पर्वत शृंखला । यह केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि उत्तर भारत की नियति को निर्धारित करने वाली एक जीवंत महागाथा है।

अरावली का सर्वाधिक महत्व इसकी सामरिक और पारिस्थितिक स्थिति में निहित है। यह पर्वत शृंखला थार के मरुस्थल के विस्तार के विरुद्ध एक 'अजेय प्राचीर' की भांति खड़ी है। यदि अरावली के ये ऊँचे शिखर और घने वन न होते, तो अब तक मरुस्थल की तपती रेत दिल्ली, हरियाणा और उपजाऊ गंगा-यमुना के मैदानों को अपने आगोश में ले चुकी होती। यह शृंखला न केवल धूल भरी आँधियों को रोकती है, बल्कि दक्षिण-पश्चिम मानसून को दिशा देकर उत्तरी भारत में वर्षा का आधार बनती है।

अरावली को 'जल-स्तंभ' कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। इसकी शिराओं में बहने वाला जल और इसकी तलहटी में स्थित प्राकृतिक जल-निकाय (जैसे अरावली की झीले और जलाशय) भू-जल स्तर को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य हैं। आज जब हम जल संकट की विभीषिका झेल रहे हैं, तब अरावली के संरक्षण का अर्थ है— हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्यास बुझाने का प्रबंध करना।

अत्यंत क्षोभ का विषय है कि जिस अरावली ने हमें जीवन दिया, आज वही मानवीय लोभ की वेदी पर चढ़ाई जा रही है। अनियंत्रित और अवैध खनन ने कहीं-कहीं तो पर्वतों का अस्तित्व ही मिटा दिया है। 'पहाड़ के गायब होने' की घटनाएँ केवल भौतिक क्षति नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ किया गया वह विश्वासघात है जिसकी परिणति विनाशकारी बाढ़, बढ़ते तापमान और लुप्त होते वन्यजीवों के रूप में हमारे सामने है। अरावली का 'ग्रीन पैच' (हरित क्षेत्र) संकुचित हो रहा है, जो दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जैसे क्षेत्रों के लिए 'फेफड़ों के कैंसर' के समान है।

अरावली के संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पर पूर्ण विराम लगाना अनिवार्य है। देशी प्रजातियों के वृक्षों का रोपण कर अरावली के खोए हुए गौरव को लौटाना होगा। इसे 'पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र' के रूप में कड़ाई से लागू करना होगा ताकि कंक्रीट के जंगल इसे निगल न सकें।

अरावली का संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारा अस्तित्व बचाने का अंतिम मार्ग है। यदि हम इन शिलाओं की रक्षा नहीं कर सके, तो इतिहास हमें क्षमा नहीं करेगा।

जय कुमार

                                      प्रधान-सम्पादक

द्वितीयाकृष्णपक्ष, माघ, विक्रम सम्वत् २०८2  

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