समस्याएँ जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। शिकायतों से न समाधान मिलता है, न शांति; उल्टा मन इतना भर जाता है कि वास्तविक ज़िम्मेदारी निभाने की क्षमता कम होने लगती है। एक दिन सिया ने बताया कि एक वर्ष के पोते की देखभाल करते हुए बहू-बेटे से अक्सर यह सुनने को मिलता — “यह रात को सोता नहीं… दिन भर तंग करता है…”
एक दिन सहजता से मैंने कह दिया — “तुम्हारे पास विकल्प है, मेरे कान हैं — इसलिए शिकायतें भी हैं।”
“बच्चे की हर आदत का कोई कारण होता है। जब वह तीन-चार महीने का था, उसे सोते हुए भी उठाकर तालू में गुदगुदी कर दूध पिलाने की आदत डाल दी — डॉक्टर की सलाह बताकर। आदतें जब एक बार बन जाती हैं, तो बच्चा उन्हें छोड़ने में समय लेता है। पर जब आधी रात को मैं इसे ले लेती हूँ, तो यही बच्चा तीन-चार घंटे चैन से सो जाता है। तो शिकायत किससे है? बच्चे से, परिस्थितियों से या अपनी जीवन शैली से?”
“विचार करने वाली बात यह है कि टीवी देखने को तुम्हें दो घंटे मिल जाते हैं, फोन पर बात करने को डेढ़-दो घंटे, घूमने-फिरने को भी समय है — फिर भी तुम्हें तृप्ति नहीं है। तुम्हारी नींद पूरी नहीं होती, तो केवल इसलिए क्योंकि तुम्हें मैं दिखती हूं। जिनकी आँखों के सामने एक सशक्त सहारा होता है — वे अक्सर ज़िम्मेदारी का भार पीछे सरका देते हैं।”
“याद है, तुमने कल रात बहुत प्यार से पूछा और रसोई में जाकर खिचड़ी बनाई। लेकिन खिचड़ी के लिए दो घंटे इंतज़ार करना पड़ा। खिचड़ी स्वादिष्ट
बनी थी, प्यार से परोसी भी गई थी, लेकिन तब तक भूख गायब हो गई थी।”
“मैंने सारे घर के काम संभाल रखे हुए हैं, जिम्मेदारियाँ मेरे कंधों पर हैं। साथ में पोते को भी तीन-चार घंटे पार्क में घूमा लाती हूं। फिर भी तुम्हारी नींद पूरी नहीं होती तो तुम्हें अपने ही अंदर झांकना है।”
मेरी इन बातों ने बेटे-बहू को मौन कर दिया। धीरे-धीरे बहू की आँखों में शर्मिंदगी के आँसू छलक आए। उसके मन में एक अठखेलियत-सी मुस्कान थी – जैसे उसे अपनी गलती का एहसास हो गया हो।
सुबह होते ही बहू ने मेरे गाल को प्यार से चूमा। मुस्कराहट से सारा वातावरण भर गया– और मन में एक सुकून की लहर दौड़ गई।

