आज के तीव्र गति वाले डिजिटल युग में बच्चों का अधिकांश समय मोबाइल, टीवी और इंटरनेट पर व्यतीत हो रहा है। ऐसे में पुस्तक पढ़ने की आदत धीरे-धीरे कम होती जा रही है। जबकि पुस्तकें केवल ज्ञान का भंडार ही नहीं, बल्कि संस्कार, कल्पनाशक्ति, भाषा-समृद्धि और व्यक्तित्व निर्माण का सशक्त माध्यम भी हैं। बच्चों में प्रारम्भ से ही पुस्तक पढ़ने की आदत डालना उनके सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
पुस्तकें मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर हैं। वे मनुष्य के अनुभवों, विचारों और भावनाओं का संचित रूप हैं। बच्चों के लिए पुस्तकें एक ऐसे मित्र के समान हैं जो न कभी थकते हैं, न डाँटते हैं, बल्कि चुपचाप बहुत कुछ सिखा देते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था— “अच्छी पुस्तकें मनुष्य की सच्ची मित्र होती हैं।” यह कथन बच्चों पर भी पूर्णतः लागू होता है, क्योंकि बचपन में मिली अच्छी संगति जीवन भर दिशा देती है।
पुस्तक अध्ययन की महत्ता को समझते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बच्चों को पत्र लिखते हुए कहा था कि उन्हें पुस्तकों से प्रेम करना चाहिए, क्योंकि पुस्तकें उन्हें सोचने और समझने की शक्ति देती हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मत था कि “पढ़ना केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन को परिष्कृत करने की प्रक्रिया है।” बच्चों के लिए यह और भी आवश्यक है, क्योंकि यही अवस्था उनके संस्कारों की नींव डालती है।
पुस्तकें बच्चों की भाषा को समृद्ध बनाती हैं। नियमित पढ़ने वाले बच्चे शब्दों का सही प्रयोग करना सीखते हैं, उनकी अभिव्यक्ति स्पष्ट होती है और वे आत्मविश्वास के साथ अपने विचार प्रकट कर पाते हैं। प्रसिद्ध लेखक प्रेमचंद का विचार था कि “साहित्य मनुष्य को मनुष्य बनाता है।” जब बच्चे कहानियाँ, कविताएँ और जीवनोपयोगी प्रसंग पढ़ते हैं, तो उनके भीतर संवेदना, करुणा और नैतिक मूल्यों का विकास होता है।
पुस्तक पढ़ने से बच्चों की कल्पनाशक्ति का विस्तार होता है। कहानी पढ़ते समय वे पात्रों, स्थानों और घटनाओं की कल्पना करते हैं, जिससे उनका रचनात्मक मस्तिष्क सक्रिय होता है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था— “कल्पनाशक्ति ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है।” पुस्तकें बच्चों की इस कल्पनाशक्ति को पंख देती हैं, जो आगे चलकर नवाचार और सृजन का आधार बनती है।
बच्चों में पुस्तक पढ़ने की आदत डालने के साथ-साथ उन्हें पढ़ने का शिष्टाचार भी सिखाना आवश्यक है। पुस्तक को आदरपूर्वक हाथ में लेना, उसके पृष्ठों को मोड़ना या फाड़ना नहीं चाहिए। पृष्ठों को सावधानी से फिंगर डैम्पर का प्रयोग करके पलटना चाहिए। पन्नों पर थूक लगाकर पलटना गंदी आदत होती है, इससे हानिकारक जीवाणु अपने या दूसरे के शरीर में जाने का खतरा बढ़ जाता है। पढ़ते समय स्वच्छ हाथ रखना स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यावश्यक है-—ये सब छोटी-छोटी बातें बच्चों में अनुशासन और जिम्मेदारी का भाव उत्पन्न करती हैं। पुस्तक को पढ़ने के बाद उसे यथास्थान रखना, पुस्तकालय की पुस्तकों को समय पर लौटाना और दूसरों को भी पढ़ने का अवसर देना—ये आदतें सामाजिक संस्कार विकसित करती हैं।
पुस्तक पढ़ते समय एकाग्रता बनाए रखना भी शिष्टाचार का ही भाग है। बच्चों को यह समझाना चाहिए कि पढ़ते समय मोबाइल या अन्य व्यवधानों से दूर रहें। शांत वातावरण में बैठकर ध्यानपूर्वक पढ़ना न केवल समझ को गहरा करता है, बल्कि मन को भी स्थिर करता है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि” एकाग्रता ही ज्ञान का द्वार खोलती है। बच्चों के लिए पुस्तक पढ़ना एकाग्रता अभ्यास का सर्वोत्तम साधन बन सकता है।”
अब प्रश्न यह है कि बच्चों में पुस्तक पढ़ने की रुचि कैसे बढ़ाई जाए। इसके लिए सबसे पहले परिवार का वातावरण अनुकूल होना चाहिए। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने बड़ों को करते देखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं पुस्तकें पढ़ते हैं, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से उनकी ओर आकर्षित होंगे। घर में छोटी-सी पुस्तक अलमारी या ‘रीडिंग कॉर्नर’ बनाना बच्चों को पुस्तक के निकट लाता है।
बच्चों की आयु और रुचि के अनुसार पुस्तकों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रारम्भ में चित्र पुस्तकों, बाल कहानियों, लोककथाओं और रोचक प्रसंगों से शुरुआत करनी चाहिए। जब बच्चा पुस्तक से आनंद लेने लगे, तभी धीरे-धीरे ज्ञानवर्धक और साहित्यिक पुस्तकों की ओर उसे प्रेरित करना चाहिए। रवींद्रनाथ ठाकुर का मानना था कि “शिक्षा आनंद से जुड़ी होनी चाहिए; यही सिद्धांत पठन-अभ्यास पर भी लागू होता है।”
कहानी सुनाने की परंपरा भी बच्चों में पढ़ने की रुचि जगाने का प्रभावी माध्यम है। जब माता-पिता या शिक्षक कहानी सुनाते हैं और फिर उसी कहानी की पुस्तक बच्चे को पढ़ने के लिए देते हैं, तो उसकी जिज्ञासा बढ़ती है। कहानी के पात्रों पर बातचीत करना, उनसे जुड़े प्रश्न पूछना बच्चों को सक्रिय पाठक बनाता है।
विद्यालयों और पुस्तकालयों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाल पुस्तकालय, पुस्तक मेले, पठन सप्ताह, कहानी प्रतियोगिताएँ और पुस्तक समीक्षा जैसे कार्यक्रम बच्चों को पुस्तकों के निकट लाते हैं। डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने विद्यार्थियों को सदैव पुस्तकालय से जुड़ने की सलाह दी थी और स्वयं भी नियमित पाठक रहे। उनका मानना था कि “पुस्तकें बच्चों को बड़े सपने देखने की प्रेरणा देती हैं।”
डिजिटल युग में ई-पुस्तकें और ऑडियो बुक्स का उपयोग भी रुचि बढ़ाने में सहायक हो सकता है, परन्तु संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यदि तकनीक को पुस्तक प्रेम का माध्यम बनाया जाए, तो बच्चे स्क्रीन पर भी गुणवत्तापूर्ण साहित्य से जुड़ सकते हैं। परंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि डिजिटल साधन पुस्तक का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक हों।
बच्चों को पढ़ने के लिए कभी बाध्य नहीं करना चाहिए। दबाव के स्थान पर प्रेरणा और प्रोत्साहन अधिक प्रभावी होता है। छोटी-छोटी उपलब्धियों पर प्रशंसा करना, पढ़ी गई पुस्तक पर बातचीत करना, या किसी पुस्तक को उपहार में देना—ये उपाय बच्चों के मन में पुस्तक के प्रति सकारात्मक भाव उत्पन्न करते हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि बच्चों में पुस्तक पढ़ने की आदत डालना एक सतत प्रक्रिया है। यह केवल शैक्षणिक सफलता के लिए नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों, नैतिकता और मानवीय संवेदना के विकास के लिए आवश्यक है। फ्रांसिस बेकन ने कहा था— “पुस्तकें मनुष्य को पूर्ण बनाती हैं।” यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे ज्ञानवान, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनें, तो उन्हें पुस्तकों से जोड़ना ही होगा।
पुस्तकें बच्चों के लिए केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि सपनों की सीढ़ी हैं। जब एक बच्चा पुस्तक खोलता है, तो उसके सामने एक नई दुनिया खुल जाती है। यही दुनिया उसे सोचने, समझने और बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में आगे बढ़ाती है। इसलिए बच्चों के जीवन में पुस्तकों का स्थान सुरक्षित और सुदृढ़ करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
-गौरीशंकर वैश्य विनम्र
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